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पहाड़ में निजी विश्वविद्यालय खोलना हुआ आसान: धामी सरकार ने दी बड़ी राहत, भूमि के बजाए 'कवर्ड एरिया' बना नया मानक

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देहरादून। उत्तराखंड के पर्वतीय (पहाड़ी) इलाकों में उच्च शिक्षा के प्रसार और पलायन को रोकने की दिशा में राज्य सरकार ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में आयोजित कैबिनेट बैठक में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना से जुड़ी नीति और भूमि संबंधी कड़े मानकों में संशोधन को मंजूरी दे दी गई है। सरकार के इस कदम से अब विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले पहाड़ी जिलों में प्राइवेट यूनिवर्सिटी खोलना बेहद आसान और व्यावहारिक हो जाएगा।

उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के नए संस्थान स्थापित करने की राह अब आसान होगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए निर्धारित नीति एवं मानकों में संशोधन को मंजूरी दे दी गई है। सरकार के इस फैसले से खासतौर पर पर्वतीय क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के इच्छुक संस्थानों को भूमि संबंधी मानकों में राहत मिलेगी। सरकार का मानना है कि राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए मौजूदा भूमि मानकों में बदलाव से पहाड़ों में उच्च शिक्षा के संस्थानों की स्थापना अधिक व्यावहारिक हो सकेगी। संशोधित व्यवस्था के तहत अब पर्वतीय क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए न्यूनतम 2,500 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र होना जरूरी होगा। वहीं मैदानी क्षेत्रों में यह सीमा 20,000 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र निर्धारित की गई है। यानी विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए केवल बड़े भूखंड की उपलब्धता को आधार बनाने के बजाय निर्मित क्षेत्र को भी प्रमुख मानक बनाया गया है। मौजूदा व्यवस्था में पर्वतीय क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए 2.5 एकड़ भूमि पांच किलोमीटर की परिधि में अधिकतम तीन स्थानों पर उपलब्ध होने का प्रावधान था। मैदानी क्षेत्रों में यह मानक 10 एकड़ भूमि का था। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति, जमीन की उपलब्धता और अलग-अलग स्थानों पर बसे क्षेत्रों को देखते हुए इन मानकों को व्यावहारिक बनाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी। अब कैबिनेट ने जमीन के क्षेत्रफल के बजाय निर्मित क्षेत्र को आधार बनाने का निर्णय लिया है। इससे ऐसे संस्थानों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो पहाड़ी क्षेत्रों में विश्वविद्यालय स्थापित करना चाहते हैं लेकिन एक स्थान पर बड़े भूखंड की उपलब्धता उनके लिए चुनौती बनती है। निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना से जुड़े वित्तीय मानकों में भी संशोधन किया गया है। पर्वतीय क्षेत्रों में तीन करोड़ रुपये और मैदानी क्षेत्रों में पांच करोड़ रुपये की स्थायी विन्यास निधि से संबंधित प्रावधान में बदलाव किया गया है। इसी तरह बैंक खाते में मैदानी क्षेत्रों के लिए न्यूनतम 20 करोड़ रुपये और पर्वतीय क्षेत्रों के लिए दो करोड़ रुपये की व्यवस्था से संबंधित प्रावधान को भी समाप्त किया गया है। इसके साथ ही प्रोसेसिंग शुल्क की धनराशि में भी कमी की गई है। सरकार का उद्देश्य निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए अनावश्यक वित्तीय और भौतिक बाधाओं को कम करना है, ताकि राज्य में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा मिल सके। सरकार ने मानकों में राहत के साथ निजी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की व्यवस्था पर भी जोर दिया है। नए प्रस्तावों के मूल्यांकन के लिए निर्धारित गुणवत्ता मानक तय किए जाएंगे। निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के इच्छुक संस्थानों के प्रस्तावों का इन्हीं मानकों के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा। इससे सरकार का प्रयास है कि नियमों में ढील का लाभ केवल संस्थानों की संख्या बढ़ाने तक सीमित न रहे, बल्कि नए विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता, संसाधन और आवश्यक सुविधाएं भी सुनिश्चित हों। कैबिनेट के इस निर्णय को उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। भूमि की उपलब्धता और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण जिन क्षेत्रों में बड़े भूखंड पर विश्वविद्यालय स्थापित करना कठिन था, वहां अब संशोधित मानकों के तहत संस्थानों के लिए संभावनाएं बढ़ सकती हैं। इससे पहाड़ी क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ने और स्थानीय स्तर पर शैक्षिक ढांचे को मजबूत करने की उम्मीद है।