पर्वतीय क्षेत्रों में आबादी की कमी का संकट: जनगणना 2026 बताएगा उत्तराखंड के पहाड़ों का भविष्य

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उत्तराखंड में लंबे समय से चर्चा का विषय बने पलायन और उससे खाली हो चुके गांवों की वास्तविक स्थिति अब सामने आने वाली है। राज्य में 25 अप्रैल से शुरू होने वाली जनगणना के पहले चरण के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रदेश में पलायन के कारण खाली हुए ‘घोस्ट विलेज’ की संख्या कितनी बढ़ी है। जनगणना निदेशालय ने राज्य के सभी गांवों की व्यापक गणना करने का निर्णय लिया है, जिससे पलायन और रिवर्स पलायन की वास्तविक स्थिति का आकलन किया जा सकेगा। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार उत्तराखंड में कुल 16,793 गांव दर्ज किए गए थे। इनमें से 1,048 गांव ऐसे थे जो पूरी तरह से खाली हो चुके थे और जिन्हें ‘घोस्ट विलेज’ की श्रेणी में रखा गया था। पिछले डेढ़ दशक में पहाड़ों से पलायन का मुद्दा लगातार राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बना रहा है। इसी समस्या को देखते हुए राज्य सरकार ने उत्तराखंड प्रवासन आयोग का गठन भी किया था, जो रिवर्स पलायन यानी लोगों को वापस गांवों में बसाने के लिए विभिन्न योजनाओं पर काम कर रहा है।

जनगणना निदेशालय के निदेशक ईवा आशीष श्रीवास्तव के अनुसार, इस बार जनगणना प्रक्रिया के दौरान राज्य के हर गांव तक टीम पहुंचेगी। उन्होंने बताया कि जनगणना का पहला चरण 25 अप्रैल से 24 मई के बीच होगा, जिसमें भवन सूचीकरण और मकान गणना का कार्य किया जाएगा। इसके बाद अगले वर्ष 9 से 28 फरवरी के बीच जनगणना का दूसरा चरण आयोजित किया जाएगा, जिसमें जनसंख्या से जुड़ी विस्तृत जानकारी एकत्र की जाएगी। 2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश के कई पर्वतीय जिलों में बड़ी संख्या में गांव खाली पाए गए थे। इनमें पौड़ी गढ़वाल जिले में सबसे अधिक 331 घोस्ट विलेज दर्ज किए गए थे। इसके अलावा पिथोरागढ़ में 103, अल्मोड़ा में 105, टिहरी गढ़वाल में 88 और चमोली में 76 गांव खाली पाए गए थे। वहीं बागेश्वर में 73 और चम्पावत में 55 गांव पूरी तरह से निर्जन हो चुके थे। नई जनगणना से यह स्पष्ट होगा कि पिछले 16 वर्षों में इन गांवों की स्थिति में कितना बदलाव आया है। सरकार की ओर से रिवर्स पलायन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं, लेकिन इन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव क्या रहा, इसका आकलन भी इसी प्रक्रिया के बाद संभव हो सकेगा। जनगणना की तैयारियों को लेकर भी प्रशासन सक्रिय हो गया है। जनगणना निदेशालय की ओर से 9 मार्च से देहरादून में मास्टर ट्रेनरों का प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। इस प्रशिक्षण में अधिकारियों और कर्मचारियों को मकान सूचीकरण, मकान गणना और डेटा संग्रह के दौरान बरती जाने वाली सावधानियों के बारे में विस्तार से बताया जाएगा। साथ ही मोबाइल एप और ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से जानकारी दर्ज करने की प्रक्रिया भी समझाई जाएगी। ये मास्टर ट्रेनर बाद में प्रदेश के विभिन्न जिलों में जाकर जनगणना कर्मियों को प्रशिक्षण देंगे। अधिकारियों का मानना है कि इस बार की जनगणना से उत्तराखंड में पलायन, आबादी के बदलाव और ग्रामीण क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति की स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।